*देश की सरकार राजतंत्र की ओर*
लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसमें सवाल पूछने का अधिकार होता है। राजतंत्र में सवाल ही अपराध बन जाता है। आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो लोकतंत्र का चेहरा धुंधला और राजतंत्र की परछाई गहरी होती दिख रही है।
राजतंत्र की पहली पहचान है – सत्ता का केंद्रीकरण। जहाँ सारी शक्ति, सारे फैसले, सारी घोषणाएँ एक ही व्यक्ति, एक ही कार्यालय, एक ही चेहरे से निकलती हों। मंत्रिमंडल केवल नाम का रह जाए, संसद केवल तालियों के लिए रह जाए, और संस्थाएँ केवल आदेशों का पालन करने वाली बन जाएँ। यह लोकतंत्र नहीं, आधुनिक राजतंत्र का नया रूप है।
दूसरी पहचान है – प्रचार को शासन से बड़ा बना देना। राजा के समय में उसके यशगान के लिए चारण होते थे। आज वही भूमिका विशाल प्रचार तंत्र, मीडिया और सोशल मीडिया निभा रहे हैं। सरकार की नीतियों पर बहस कम, व्यक्ति के गुणगान पर बहस ज्यादा होती है। जब नागरिक को भक्त में बदल दिया जाए, तो समझिए राजतंत्र का रास्ता खुल चुका है।
तीसरी पहचान है – विरोध को देशद्रोह बताना। लोकतंत्र में विपक्ष जरूरी होता है, राजतंत्र में विपक्ष अपराध। जब पत्रकार, छात्र, किसान या आम नागरिक सवाल पूछे और उसे तुरंत विरोधी, टुकड़े-टुकड़े गैंग या राष्ट्र-विरोधी कह दिया जाए, तो यह राजा की मानसिकता है, सेवक की नहीं।
चौथी पहचान है – संस्थाओं की चुप्पी। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, जांच एजेंसियां, मीडिया – जब ये सब एक ही दिशा में झुकने लगें, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। राजतंत्र में सब राजा के अधीन होते हैं, लोकतंत्र में सब संविधान के अधीन।
आज जरूरत है कि हम समझें – हमने राजाओं को इसलिए नहीं हटाया था कि नए कपड़ों में नया राजतंत्र आ जाए। हमने लोकतंत्र इसलिए चुना था ताकि कोई भी खुद को देश से बड़ा न समझे।
लोकतंत्र जिंदा तभी रहता है जब जनता खुद को प्रजा नहीं, नागरिक समझे।
